आदमी अपने जीवन में ऐसे बहुत सारे आयामों से गुजरता है जहाँ वह अपने आप को अकेला पता है. कुछ इसी तरह आज प्रताप महशूश कर रहा है. ५ साल पहले जब उसने मेडिकल की तैयारी शुरु की थी तब उसे नहीं पता था की वह कभी ये दिन भी देखेगा पर प्रताप को देखना पड़ा, कारण उसे भी पता नहीं था.
लगातार प्रयास के बाद भी प्रताप का चयन एम. बी. बी. स मेडिकल प्रवेश परीछा में नहीं हुआ यह उसका ५ वां साल था. प्रताप ने जब मेडिकल प्रवेश की लिए तयारी शुरु की थी तब उसके हाथ में १० + २ डिग्री थी और आज भी वही डिग्री. ऐसा नहीं था की प्रताप पढने में होशियार नहीं था पर किस्मत में जो लिखा था वही हुआ. लगातार 4 वर्षों तक उसका चयन बी. च. एम्. एस और बी. वी. स. सी में हुआ पर जनरल कोटे में सीट कम होने से उसे एम. बी. बी. स नहीं मिल पा रहा था, कुछ, २-३ नंबर कम रह जा रहे थे. प्रताप ने एम. बी. बी. स करने के धुन में किसी में भी दाखिला नहीं लिया. यह उसका ५ साल था और उसने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
आज ही मेडिकल का रिजल्ट आने वाला था, प्रताप को उसका बेताबी से इंतज़ार था पर जब उसने सुबह अखबार देखा तो उसके होश उड़ गये. मेडिकल का रिजल्ट रोक दिया गाया था कारण पेपर लीक होने का मामला था. प्रताप को तो ऐसा लग रहा था जैसे की अभी वह धडाम से जमीन पर गिर पड़ेगा. वैसे पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं थी पर इस बार पूराने सारे रिकॉर्ड टूट गये थे, ५०-५० हज़ार में कोचिंग वालों ने पेपर बेचे थे कुछ टेस्ट सिरीज के नाम पर तो कुछ गेस पेपर के नाम पर. अब कोई कितना भी मेहनत कर ले क्या फर्क पड़ता है चयन तो उन्ही का होगा जिनके पास ५० हजार हैं.
प्रताप बहुत टूट गाया था और उसमें कुछ भी सुनने और समझने की ताकत नहीं बची थी. मायूस होकर जब वह घर पहुंचा तो घर वाले उसे ही गली दे रहे थे की ५ साल से तयारी कर रहे थे तुम होना होता तो हो गाया होता अब आगे क्या करने का विचार है. सभी घर वालों ने उससे मुहं मोड़ लिया की कहीं ऐसा ना हो की प्रताप को फिर से एक साल के लिए पैसे देने पड़े.
अब प्रताप इस मोड़ पर है की उसके पास सिर्फ १०+२ की डिग्री है जिसके बल पर उसे कहीं नौकरी नहीं मिल सकती.
यह कहानी कितने और लोगों की होगी कहना मुस्किल होगा पर इतना तो साफ़ है की आजाद भारत को एक बार फिर से आजाद होना होगा इन माफियाओं, सरगनों और दबंगों से...........
तेज प्रताप सिंह "तेज"
Monday, December 6, 2010
Thursday, August 19, 2010
सबसे छोटी जाति किशान
आप सभी लोगों से कभी न कभी ये जरूर पूछा गया होगा की आप क्या करते हैं या आप का बेटा क्या करता है. आज मोहन भी इस सवाल से बच नहीं पाया या यह कहिये की मोहन से जान बूझ कर ये सवाल पूछा गया. मोहन अपने एक मित्र रोहन की शादी में गया था. सभी अपने-अपने तरीके से शादी का आनन्द ले रहे थे तभी अचानक एक आवाज आयी...आरे भाई अन्दर आ जाईये वरमाला पड़ने वाली है.
"यार मोहन चलो हम भी चलते हैं
हाँ चलते हैं......"
यह कहकर मोहन अपने उस नए बने मित्र के साथ वरमाला मंच के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया.
दोनों ने वरमाला का रश्म निभाया फिर जाकर रोहन के घर वालों के साथ बातें करने लगे.
"रोहन बेटा इनसे मिलो ये हैं मिश्रा जी...जानते हो इनका बेटा डॉक्टर हो गया है.
ये तो बहुत अच्छी बात है..अब तो आप बहुत खुश होंगे..मोहन बोला
हाँ भाई मेरे लड़के ने तो मेरा नाम रोशन कर दिया."
मोहन ने सहमती से सर हिलाया और फिर खाना लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद खाना लेकर जब वह लौटा तो वहां पर कुछ और लोग आकर खड़े हो गए थे.
नमस्ते अंकल..मोहन ने विनम्रता का परिचय दिया ????
हाँ नमस्ते बेटा कैसे हो.....!!!!
इतनी देर में रोहन भी वहां आ गया था...
भाई आप के बेटे ने तो वो काम किया है जो काबिले तारीफ है. आईएस बनना कोई मामूली बात तो नहीं हो सकती..
"बधाई हो बेटा......!!
हाँ इतना ही क्यों आप की बहू भी तो अब इंजीनियरिंग पूरा करेने वाली है.
सब आप लोगों की कृपा है...रोहन के पापा बोले"
मोहन भी सब की हाँ में हाँ मिला रहा था की तब तक किसी ने पूछ ही लिया
"बेटा तुम क्या करते हो....??
थोडा चुप होते हुए बोला मैं तो..!!! कुछ नहीं घर पर ही खेती देखता हूँ.
अच्छा तो किसान हो"...कहीं से एक व्यंग्य भरी आवाज आयी.
"मोहन चुप रहा फिर बोला पता नहीं पर खेती करना मुझे अच्छा लगता है."
अब लोगों ने मोहन से थोडा बात करना कम कर दिया और धीरे-धीरे वहां से हटने लगे.
उसको ऐसा लगने लगा जैसे अचानक वह अछूत हो गया हो. अब जादा देर मोहन से रुका न गया. मोहन तुरंत वहां से चल दिया पर वह इस बात को सोचता रहा की जब लोगों को यह पता था की मैं खेती करता हूँ तो फिर पूछा क्यों.
जाति के आधार पर लोगों को बटते तो बहुत बार देखा था पर काम और नौकरी के आधार पर पहली बार ....वैसे भी हमारी जातियां काम के आधार पर ही बांटी गयी थीं पर आज आप इनका हाल तो देख ही रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब ये जातियां विलुप्त हो जाएगी और उनकी जगह नई जातियां आ जायेगी. तब आप को शायद मिश्रा जी, श्रीवास्तव जी, पंडित जी, ठाकुर जी कहकर न पुकारा जाये बल्कि डॉक्टर जी, इंजिनियर जी, मास्टर जी, पुलिश जी, वैज्ञानिक जी......कहकर पुकारा जाये और इनमें जो सबसे छोटी जाति होगी वो किशान होगी.
तेज प्रताप सिंह `तेज`
Friday, August 13, 2010
बटाई का धान
अन्दर से आवाज आई........
"अब तो खुश हो ना
हाँ काहे ना रही...तोका कोनो परेशानी है का
हाँ-हाँ अब तो खुश रहोगे ही..बटाई पर खेत जो मिल गाया है
भला हो राम सिंह का जिसने मुझे शहर में जाकर मजदूरी करने से बचाया"
स्वामी हर छमाही शहर जाता था और घर को चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता था पर इस बार राम सिंह ने उसे कुछ खेत बटाई पर देकर यहीं गाँव में रूककर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. पहले स्वामी थोडा सोंच में पड़ा पर अपनी धर्म पत्नी शोभा के समझाने से वह गाँव में रुक कर खेती करने के लिए तैयार हो गाया.
........................................................................................................................................................
आज राम सिंह बहुत खुश था, होता क्यों नहीं लहलहाते धान के खेत उसकी ख़ुशी और मेहनत के गवाह थे.
"शोभा जानती हो!! धान बेचकर मैं क्या खरीदूंगा?
क्या, भला मैं भी तो जानू?
तेरे लिए गले का हार...मुझे तेरा खाली गला अच्छा नहीं लगता
रहने भी दो ये हार-वार, घर के छत से पानी टपक रहा है पहले वो बनवा लो....
हाँ वो भी बनवा दूंगा...
अच्छा-अच्छा ठीक है अब आकर खाना खा लो.."
स्वामी और शोभा दोनों आमने-सामने बैठकर एक ही थाली में खाने लगे. मन ही मन जैसे दोनों बातें कर रहे हों की फसल कटने के बाद पहले हम राम सिंह के पास जाकर उनका धन्यवाद देंगे की उनकी दया से ही अब हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. राम सिंह जैसा आदमी अगर हर गाँव में हो जाये तो ना जाने कितने मजदूर शहर जाने से बच जाएँ.
..............................................................................................................................................................
काली रात थी..आसमान में बादल अपने उफान पर थे.
शोभा ये बादल तो लग रहा है आज कुछ गुल खिला के ही जायेंगे
अच्छा है ना फसल में पानी लग जाएगा
ठीक बोल रही है तू..अब दरवाजा बंद कर दो सोने चलते हैं
दोनों ने चादर अपने चेहरे पर डाली और सोने लगे लेकिन टपकती छत ने उनकी नीद तोड़ दी ...
शोभा ये बादल गये नहीं अभी तक
हाँ लग रहा है सही में कुछ गुल खिला कर जाएँगे
बंद कर अपनी ये मनहूस आवाज...शुभ-शुभ बोल!!!
दोनों के आँखों से नींद जा चुकी थी पर बादल अभी तक नहीं गये थे. एक-एक घडी कर के सुबह कब हो गयी दोनों को पता ही नहीं चला. अगले दिन तो वो कुछ बोलने लायक बचे ही नहीं.
जो फसल उनकी आँखों के सामने कल तक लहलहा रही थी, आज वह पानी में तैर रही थी, मानों इशारे से कह रही हो की मैं तुम्हारी जिंदगी में ख़ुशी ना ला सकी इसका मुझे बहुत दुःख है.
स्वामी के नशीब में तो जैसे शहर में जाकर मजदूरी करना ही लिखा है, बेकार में उसने थोड़ी दिन सपने देखे.
स्वामी ही क्यों और भी हैं जिनके सपने पानी में तैर रहे हैं और ना जाने कब तक तैरते रहेंगे.
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"अब तो खुश हो ना
हाँ काहे ना रही...तोका कोनो परेशानी है का
हाँ-हाँ अब तो खुश रहोगे ही..बटाई पर खेत जो मिल गाया है
भला हो राम सिंह का जिसने मुझे शहर में जाकर मजदूरी करने से बचाया"
स्वामी हर छमाही शहर जाता था और घर को चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता था पर इस बार राम सिंह ने उसे कुछ खेत बटाई पर देकर यहीं गाँव में रूककर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. पहले स्वामी थोडा सोंच में पड़ा पर अपनी धर्म पत्नी शोभा के समझाने से वह गाँव में रुक कर खेती करने के लिए तैयार हो गाया.
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आज राम सिंह बहुत खुश था, होता क्यों नहीं लहलहाते धान के खेत उसकी ख़ुशी और मेहनत के गवाह थे.
"शोभा जानती हो!! धान बेचकर मैं क्या खरीदूंगा?
क्या, भला मैं भी तो जानू?
तेरे लिए गले का हार...मुझे तेरा खाली गला अच्छा नहीं लगता
रहने भी दो ये हार-वार, घर के छत से पानी टपक रहा है पहले वो बनवा लो....
हाँ वो भी बनवा दूंगा...
अच्छा-अच्छा ठीक है अब आकर खाना खा लो.."
स्वामी और शोभा दोनों आमने-सामने बैठकर एक ही थाली में खाने लगे. मन ही मन जैसे दोनों बातें कर रहे हों की फसल कटने के बाद पहले हम राम सिंह के पास जाकर उनका धन्यवाद देंगे की उनकी दया से ही अब हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. राम सिंह जैसा आदमी अगर हर गाँव में हो जाये तो ना जाने कितने मजदूर शहर जाने से बच जाएँ.
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काली रात थी..आसमान में बादल अपने उफान पर थे.
शोभा ये बादल तो लग रहा है आज कुछ गुल खिला के ही जायेंगे
अच्छा है ना फसल में पानी लग जाएगा
ठीक बोल रही है तू..अब दरवाजा बंद कर दो सोने चलते हैं
दोनों ने चादर अपने चेहरे पर डाली और सोने लगे लेकिन टपकती छत ने उनकी नीद तोड़ दी ...
शोभा ये बादल गये नहीं अभी तक
हाँ लग रहा है सही में कुछ गुल खिला कर जाएँगे
बंद कर अपनी ये मनहूस आवाज...शुभ-शुभ बोल!!!
दोनों के आँखों से नींद जा चुकी थी पर बादल अभी तक नहीं गये थे. एक-एक घडी कर के सुबह कब हो गयी दोनों को पता ही नहीं चला. अगले दिन तो वो कुछ बोलने लायक बचे ही नहीं.
जो फसल उनकी आँखों के सामने कल तक लहलहा रही थी, आज वह पानी में तैर रही थी, मानों इशारे से कह रही हो की मैं तुम्हारी जिंदगी में ख़ुशी ना ला सकी इसका मुझे बहुत दुःख है.
स्वामी के नशीब में तो जैसे शहर में जाकर मजदूरी करना ही लिखा है, बेकार में उसने थोड़ी दिन सपने देखे.
स्वामी ही क्यों और भी हैं जिनके सपने पानी में तैर रहे हैं और ना जाने कब तक तैरते रहेंगे.
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Saturday, August 7, 2010
लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं
.....................................................................................................................................................................आज ही इंजीनियरिंग कॉलेज का रिजल्ट आया था....
"बेटा मनोज तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?
हाँ पापा लिस्ट में दूसरा नंबर है, अच्छा कॉलेज मिल जायेगा
गुड, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ.
वो तुम्हारे दोस्त सोनू का क्या हुआ ?
पापा उसको शायद कोई कॉलेज ना मिल पाए उसके नंबर बहुत कम हैं.
चलो कोई बात नहीं अगली बार शायद उसे भी कुछ अच्छा मिल जाये."
अगले दिन मनोज कॉलेज में दाखिला लेने पहुंचा तो उसे वहां सोनू के पापा भी मिल गये.
"हाँ बेटा मनोज कैसे हो...कैसा चल रहा है सब कुछ.
मैं अच्छा हूँ ...कॉलेज में दाखिला लेने आया हूँ
बधाई हो..
पर आप यहाँ कैसे?
हाँ.. मैं भी सोनू का दाखिला कराने आया हूँ"
मनोज को तो बात समझ में नहीं आई कि आखिर सोनू को कैसे दाखिला मिल सकता है.
यही सोचता हुआ वह सोनू के पापा को नमस्ते करके अन्दर दाखिले के लिए चला गाया.
......................................................................................................................................................................
दाखिला लेकर मनोज जब घर वापस आया तो बहुत परेशान था ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने आप को कोश रहा हो कि इतना पढने का क्या फ़ायदा जब सोनू को बिना मेहनत किये दाखिला मिल रहा है. इतने में उसके पापा आ गये, उसको परेशान देखकर पूँछ पड़े क्या हुआ सब कुछ ठीक तो है ना. मनोज ने दुखी मन से सारी बात बताई.
ये तो गलत है..पर ये सब हुआ कैसे? कोई बात नहीं तुम इसकी चिन्ता मत करो और आगे के बारे में सोचो.
मनोज ने सहमती से सिर हिलाकर बाहर चला गाया.
अगले दिन मनोज घर से थोडा जल्दी निकला यह पता करने के लिए कि ये सब हुआ कैसे.
कुछ दोस्तों से मिलने के बाद जो उसे पता चला उससे तो वह और भी परेशान हो गाया.
मनोज के लिए ये कोई छोटी बात नहीं थी कि पैसे देकर कोई इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला कैसे ले सकता है. वह मन ही मन में सोंच रहा था कि मैंने इतनी पढाई कि इस कॉलेज में दाखिला मिल जाये, दिन रात एक कर दिया पर जब लोग यहाँ पैसे से दाखिला ले रहे हैं तो ये कॉलेज अच्छा कैसे हो सकता है. मनोज ने मन में ठान ली कि वह अब इस कॉलेज से अपना नाम हटा कर किसी और कॉलेज में जायेगा जो शायद देखने में अच्छा ना हो पर सरस्वती कि पूजा करता हो.
......................................................................................................................................................................
सोनू के पापा आज बहुत गर्व से कह रहे हैं कि मेरा बेटा बी टेक कर रहा है और किसी के बेटे से कम नहीं है. लेकिन इस गर्व के पीछे एक कडवा सच ये है कि अगर सोनू को अपने बल पर बी टेक करना होता तो आज भी वो घर में बैठा होता. पैसे में इतनी ताकत कहाँ से आ गयी जो आज लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं और देश में बने ना जाने कितने कॉलेज इन्हें बेच रहे हैं.
भ्रस्टाचार के लिए हम सरकार को कोसते हैं पर कभी अपने दामन को नहीं देखते. मुझे तो लग रहा है देश तो आगे बढ रहा है पर देश के लोग नहीं.
खून वो नहीं जो सिर्फ अपने बाजुओं में बहे
तेज प्रताप सिंह `तेज`
"बेटा मनोज तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?
हाँ पापा लिस्ट में दूसरा नंबर है, अच्छा कॉलेज मिल जायेगा
गुड, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ.
वो तुम्हारे दोस्त सोनू का क्या हुआ ?
पापा उसको शायद कोई कॉलेज ना मिल पाए उसके नंबर बहुत कम हैं.
चलो कोई बात नहीं अगली बार शायद उसे भी कुछ अच्छा मिल जाये."
अगले दिन मनोज कॉलेज में दाखिला लेने पहुंचा तो उसे वहां सोनू के पापा भी मिल गये.
"हाँ बेटा मनोज कैसे हो...कैसा चल रहा है सब कुछ.
मैं अच्छा हूँ ...कॉलेज में दाखिला लेने आया हूँ
बधाई हो..
पर आप यहाँ कैसे?
हाँ.. मैं भी सोनू का दाखिला कराने आया हूँ"
मनोज को तो बात समझ में नहीं आई कि आखिर सोनू को कैसे दाखिला मिल सकता है.
यही सोचता हुआ वह सोनू के पापा को नमस्ते करके अन्दर दाखिले के लिए चला गाया.
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दाखिला लेकर मनोज जब घर वापस आया तो बहुत परेशान था ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने आप को कोश रहा हो कि इतना पढने का क्या फ़ायदा जब सोनू को बिना मेहनत किये दाखिला मिल रहा है. इतने में उसके पापा आ गये, उसको परेशान देखकर पूँछ पड़े क्या हुआ सब कुछ ठीक तो है ना. मनोज ने दुखी मन से सारी बात बताई.
ये तो गलत है..पर ये सब हुआ कैसे? कोई बात नहीं तुम इसकी चिन्ता मत करो और आगे के बारे में सोचो.
मनोज ने सहमती से सिर हिलाकर बाहर चला गाया.
अगले दिन मनोज घर से थोडा जल्दी निकला यह पता करने के लिए कि ये सब हुआ कैसे.
कुछ दोस्तों से मिलने के बाद जो उसे पता चला उससे तो वह और भी परेशान हो गाया.
मनोज के लिए ये कोई छोटी बात नहीं थी कि पैसे देकर कोई इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला कैसे ले सकता है. वह मन ही मन में सोंच रहा था कि मैंने इतनी पढाई कि इस कॉलेज में दाखिला मिल जाये, दिन रात एक कर दिया पर जब लोग यहाँ पैसे से दाखिला ले रहे हैं तो ये कॉलेज अच्छा कैसे हो सकता है. मनोज ने मन में ठान ली कि वह अब इस कॉलेज से अपना नाम हटा कर किसी और कॉलेज में जायेगा जो शायद देखने में अच्छा ना हो पर सरस्वती कि पूजा करता हो.
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सोनू के पापा आज बहुत गर्व से कह रहे हैं कि मेरा बेटा बी टेक कर रहा है और किसी के बेटे से कम नहीं है. लेकिन इस गर्व के पीछे एक कडवा सच ये है कि अगर सोनू को अपने बल पर बी टेक करना होता तो आज भी वो घर में बैठा होता. पैसे में इतनी ताकत कहाँ से आ गयी जो आज लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं और देश में बने ना जाने कितने कॉलेज इन्हें बेच रहे हैं.
भ्रस्टाचार के लिए हम सरकार को कोसते हैं पर कभी अपने दामन को नहीं देखते. मुझे तो लग रहा है देश तो आगे बढ रहा है पर देश के लोग नहीं.
खून वो नहीं जो सिर्फ अपने बाजुओं में बहे
कभी धरती पर भी एक कतरा गिरा कर देखो।।
तेज प्रताप सिंह `तेज`
Wednesday, August 4, 2010
मेहनताना
रानी के बाबू जी दो महीना पहले ही सेना कि सेवा पूरी कर के आये थे. हर समय उन्हें रानी की शादी और अधूरा बना घर चिंता में डुबा देती थी. सवाल ये उठता है कि क्या सेना में इतना भी मेहनताना नहीं मिलता कि वो अपना घर बनाकर बेटी कि शादी कर सकें? जो देश के लिए अपना सर लिए घुमते हैं उनके पास ही सर छूपाने के लिए जगह नहीं होती...सवाल बहुत छोड़ा है पर जवाब शायद किसी कि पास नहीं है.
चिंता के इन्हीं कारणों ने सूबेदार राम सिंह को जल्दी पैसा बनाने के लिए मजबूर किया और वो बिना सोचे समझे जिले में एक ६ महीने पहले खुली ट्रेडिंग कंपनी में पैसा लगा दिया. कंपनी शेर बाजार में पैसा लगा कर पैसा बनाती थी. राम सिंह ने अपनी जिंदगी कि बची-कुची पूँजी कंपनी में लगा कर इस बात का इंतज़ार करने लगे कि १ साल बाद उन्हें इसका दुगना मिल जायेगा और वो अपने सारे काम आसानी से पूरा कर सकेंगे.
राम सिंह ने रानी कि शादी खोजना भी शुरु कर दिया......
बाबू जी मैं शादी नहीं करुँगी..मुझे आप के साथ ही रहना है
बेटी शादी तो करनी ही है, मुझे पता है कि तू मुझसे बहुत प्यार करती है पर मैं भी तो तुझसे उतना ही करता हूँ .
चलो बताओ इनमें से कोन सी फोटो तुम को सब से जादा पसंद है.
आप देख लो बाबू जी मुझे तो सब एक जैसे ही लगते हैं........!!!
हाँ अब तेरी पसंद भी तो देखनी पड़ेगी ना कि तुझे कौन पसंद है...अब अगर तेरी माँ आज हम लोगों के बीच होतीं तो ये फैसला भी उनके ऊपर छोड़ देते..
इतने में फ़ोन की घंटी बजी.....
हेलो...आप राम सिंह बोल रहे हैं
हाँ कहिये .....
वो शादी के बारें में बात करनी थी, कल हम लोग लड़की से मिलने आ रहे हैं अगर आप को कोई एतराज ना हो तो.
अरे इसमें एतराज करने वाली कोन सी बात है....आप लोग कल आ सकते हैं
रानी देखो कल तुमको एक लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम को कोई एतराज तो नहीं है.
नहीं बाबू जी ठीक है.............
......................................................................................................................................................................
सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी, लोग आ चुके थे रानी को देखने. लड़के वालों ने सबसे पहले लड़की से मिलने की इच्छा जताई, रानी का जैसे कमरे में प्रवेश हुआ सबकी आँखे उसके चेहरे की और दौड़ पड़ीं. रानी सचमुच रूप की रानी थी कोई भी अपनी नजर ना हटा सका उसके चेहरे से, ऐसा लगा जैसे रानी किसी बच्चे की मासूमियत छुपाये शर्म के पालने में झूल रही हो.
रानी एक ही नजर में सबको पसंद आ गयी.....
अगले ही पल लड़के के माँ ने पूछा मेरा बेटा कैसा लगा?
रानी ने हाँ कर दिया.........अब क्या था जैसे ही रानी ने हाँ कहा शादी के बात पक्की होने लगी.
राम सिंह ने भगवान को धन्यवाद दिया और दिवार पर लगी रानी के माँ की तस्वीर देखने लगे.
थोड़ी देर बाद लड़के वाले अपने घर आने का नेवता देकर वापस चले गये.
रात के ९ बजे थे की राम सिंह का फ़ोन एक बार फिर बजा....
हेलो..मैं राहुल बोल रहा हूँ
कौन राहुल????
वही जिसने आप का पैसा ट्रेडिंग कंपनी में लगवाया था.
हाँ...क्या हुआ ?
एक बुरी खबर है ......कंपनी भाग गयी
क्या....होश में तो हो की तुम क्या कह रहे हो.
हाँ मैं सच बोले रहा हूँ........
राम सिंह के पैर के नीचे से जमीन खिसकी और वह धडाम से गिर पड़ा
रानी को कुछ समझ में नहीं आया की अचानक क्या हो गया...दौड़ कर अन्दर से पानी लायी और राम सिंह को पिलाने लगी.
राम सिंह थोडा समहला और एक लम्बी गहरी साँस लेकर रानी को सब कुछ बता दिया. रानी भी पहले थोडा दुखी हुई पर अगले ही पल हंसकर बोली कोई बात नहीं बाबू जी हम फिर कमा लेंगे. इससे जादा रानी क्या बोलती उसे भी पता था की अब बहुत सारी परेशानिया एक साथ आने वाली थीं जिसमें उसकी शादी भी थी.
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इस भीड़ में सिर्फ राम सिंह ही नहीं था और भी बहुत से लोग थे जिनके सपने टूटे थे. राम सिंह अब अपनी किश्मत कोसता हा फिर सरकार जिसको हम चुनकर भेजते हैं. अब राम सिंह भी क्या करता काफी बड़े लोगों का नाम जुड़े होने के कारण जिसमें जिले के बड़े नेता और पोलिश महकमे के लोग भी थे, उसके कंपनी पर जल्दी विश्वास करने का कारण बनी थी.
राम सिंह मन ही मन सोंच रहा था कि इस देश की सरकार कब सुधरेगी और कब ऐसे लोगों पर लगाम कसेगी जो अपनी मनमानी करते फिर रहे हैं. राम सिंह देश के बाहर के दुश्मनों से तो जंग जीत गाया था पर देश के अन्दर हार गाया.
तेज प्रताप सिंह `तेज`
चिंता के इन्हीं कारणों ने सूबेदार राम सिंह को जल्दी पैसा बनाने के लिए मजबूर किया और वो बिना सोचे समझे जिले में एक ६ महीने पहले खुली ट्रेडिंग कंपनी में पैसा लगा दिया. कंपनी शेर बाजार में पैसा लगा कर पैसा बनाती थी. राम सिंह ने अपनी जिंदगी कि बची-कुची पूँजी कंपनी में लगा कर इस बात का इंतज़ार करने लगे कि १ साल बाद उन्हें इसका दुगना मिल जायेगा और वो अपने सारे काम आसानी से पूरा कर सकेंगे.
राम सिंह ने रानी कि शादी खोजना भी शुरु कर दिया......
बाबू जी मैं शादी नहीं करुँगी..मुझे आप के साथ ही रहना है
बेटी शादी तो करनी ही है, मुझे पता है कि तू मुझसे बहुत प्यार करती है पर मैं भी तो तुझसे उतना ही करता हूँ .
चलो बताओ इनमें से कोन सी फोटो तुम को सब से जादा पसंद है.
आप देख लो बाबू जी मुझे तो सब एक जैसे ही लगते हैं........!!!
हाँ अब तेरी पसंद भी तो देखनी पड़ेगी ना कि तुझे कौन पसंद है...अब अगर तेरी माँ आज हम लोगों के बीच होतीं तो ये फैसला भी उनके ऊपर छोड़ देते..
इतने में फ़ोन की घंटी बजी.....
हेलो...आप राम सिंह बोल रहे हैं
हाँ कहिये .....
वो शादी के बारें में बात करनी थी, कल हम लोग लड़की से मिलने आ रहे हैं अगर आप को कोई एतराज ना हो तो.
अरे इसमें एतराज करने वाली कोन सी बात है....आप लोग कल आ सकते हैं
रानी देखो कल तुमको एक लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम को कोई एतराज तो नहीं है.
नहीं बाबू जी ठीक है.............
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सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी, लोग आ चुके थे रानी को देखने. लड़के वालों ने सबसे पहले लड़की से मिलने की इच्छा जताई, रानी का जैसे कमरे में प्रवेश हुआ सबकी आँखे उसके चेहरे की और दौड़ पड़ीं. रानी सचमुच रूप की रानी थी कोई भी अपनी नजर ना हटा सका उसके चेहरे से, ऐसा लगा जैसे रानी किसी बच्चे की मासूमियत छुपाये शर्म के पालने में झूल रही हो.
रानी एक ही नजर में सबको पसंद आ गयी.....
अगले ही पल लड़के के माँ ने पूछा मेरा बेटा कैसा लगा?
रानी ने हाँ कर दिया.........अब क्या था जैसे ही रानी ने हाँ कहा शादी के बात पक्की होने लगी.
राम सिंह ने भगवान को धन्यवाद दिया और दिवार पर लगी रानी के माँ की तस्वीर देखने लगे.
थोड़ी देर बाद लड़के वाले अपने घर आने का नेवता देकर वापस चले गये.
रात के ९ बजे थे की राम सिंह का फ़ोन एक बार फिर बजा....
हेलो..मैं राहुल बोल रहा हूँ
कौन राहुल????
वही जिसने आप का पैसा ट्रेडिंग कंपनी में लगवाया था.
हाँ...क्या हुआ ?
एक बुरी खबर है ......कंपनी भाग गयी
क्या....होश में तो हो की तुम क्या कह रहे हो.
हाँ मैं सच बोले रहा हूँ........
राम सिंह के पैर के नीचे से जमीन खिसकी और वह धडाम से गिर पड़ा
रानी को कुछ समझ में नहीं आया की अचानक क्या हो गया...दौड़ कर अन्दर से पानी लायी और राम सिंह को पिलाने लगी.
राम सिंह थोडा समहला और एक लम्बी गहरी साँस लेकर रानी को सब कुछ बता दिया. रानी भी पहले थोडा दुखी हुई पर अगले ही पल हंसकर बोली कोई बात नहीं बाबू जी हम फिर कमा लेंगे. इससे जादा रानी क्या बोलती उसे भी पता था की अब बहुत सारी परेशानिया एक साथ आने वाली थीं जिसमें उसकी शादी भी थी.
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इस भीड़ में सिर्फ राम सिंह ही नहीं था और भी बहुत से लोग थे जिनके सपने टूटे थे. राम सिंह अब अपनी किश्मत कोसता हा फिर सरकार जिसको हम चुनकर भेजते हैं. अब राम सिंह भी क्या करता काफी बड़े लोगों का नाम जुड़े होने के कारण जिसमें जिले के बड़े नेता और पोलिश महकमे के लोग भी थे, उसके कंपनी पर जल्दी विश्वास करने का कारण बनी थी.
राम सिंह मन ही मन सोंच रहा था कि इस देश की सरकार कब सुधरेगी और कब ऐसे लोगों पर लगाम कसेगी जो अपनी मनमानी करते फिर रहे हैं. राम सिंह देश के बाहर के दुश्मनों से तो जंग जीत गाया था पर देश के अन्दर हार गाया.
तेज प्रताप सिंह `तेज`
Sunday, August 1, 2010
हमें आगे चलना है
अगर हमारी थोड़ी कोशिस से किसी के सूने जीवन मैं बहार आ जाये तो हमें वो थोड़ी कोशिस जरूर करनी चहिये"
भगवान इस संसार मैं सबको एक जैसा ही भेजते है पर समय और परिस्थितयां उसकों और लोगों से अलग कर देती हैं" ...
यहाँ तक की वह अपना सही वजूद भी खो बैड़ता है.
चलिए अब मैं आप को वहां ले चलता हूँ जहाँ मैंने अपनी भावनाओं और दिल की पीड़ा को उलझते हुए देखा है.........
क्या यार तुम तो मेरे रूम का रास्ता ही भूल गए हो....
अरे तेज ...चलो अच्छा हुआ तुम आ गए, और सुना क्या हाल है ....
मैं क्या सुनाऊँ....तू ही आज कल नजर नहीं आता है,
कोई बात है क्या ? आज कल तुम थोडा उदास रहते हो....कुछ हुआ है क्या..
नहीं यार थोडा फॅमिली प्रोब्लम है
फिर भी ..."तुम तो जानते ही हो की पिता जी के न रहने से हमें कितनी मुस्किलों का सामना करना पड़ रहा है"
मैं तुम्हारी प्रोब्लम्स को समझ सकता हूँ पर ऐसे अकेले-अकेले रहने से तो कोई काम नहीं हो सकता है
बोलो मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए ......
कोई बात नहीं यार जब जरुरत पड़ेगी तो बोलूँगा ..
हाँ पर बोल देना, कोई परेशानी वाली बात नहीं है,
इतना कहने के बाद मैंने रोहित की दी हुई चाय की आखरी चुस्की ली और चलने के लिए इजाजत मांगी ...
दुसरे दिन.....सुबह-सुबह मेरे फ़ोन की घंटी बजी, मैंने मोबाइल उठाया,
रोहित कालिंग...
हाँ!!सुबह-सुबह...
अरे यार तुम घर कब जा रहे हो...
अगले महीने..क्यों क्या हुआ?
कुछ पैसे ला सकते हो मेरे घर से,
हाँ क्यों नहीं..
२ हजार, मैंने माँ से बोले दिया है; वो तुम्हे दे देंगी..
ओके!! यार मैं ले आऊंगा लेकिन अभी जरूरत हो तो बोलो...
नहीं अभी तो मेरे पास हैं
चलो ठीक है
बाय-बाय
"रोहित की आवाज कुछ भारी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे कुछ छिपा रहा हो ...
लकिन अब किसी के मन की बात तो समझी नहीं जा सकती "..
यह सोचते सोचते मैं फिर से सो गया....अब इतवार को तो कोई उठने की जल्दी नहीं होती है ..
...........................................................
अरे जल्दी करो नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी..
हाँ आ रहा हूँ २ मिनट
हमेशा की तरह इस बार भी मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ ही घर जा रहा था ....
बातों-बातों मैं समय का कुछ पता नहीं चला, ऐसा लगा जैसे हम ट्रेन से उड़ कर घर पहुँच गए हों.
घर पहुचने पर हमें उसी तरह की ख़ुशी मिलती है जैसे की किसी फिल्म निर्माता की पहली फिल्म हिट होने पर....
अगले दिन में रोहित के घर गया
घंटी बजाई .....दरवाजा खुला तो सामने ४० साल का एक आदमी खड़ा था.
मैंने उसको अपने यहाँ आने का कारण बताया...
उसने मुझे बाहर रुकने के लिए बोला...?
"अगले पल मेरे हाथ में २००० रूपये थे. शायद मेरे आने के बारे में उसे सब कुछ पता था."
वापस आने पर मैं सबसे पहले में रोहित के घर गया
रोहित तुमने मुझे उस बार भी कुछ नहीं बताया....
अब यार कुछ खास बात होती तो मैं जरूर बताता
ओके! यार अब मैं चलता हूँ
थैंक्स यार घर से पैसे लाने के लिए
नो प्रोब्लम, कोई और काम हो तो बोल देना
इतना कहकर मैं चल दिया. लेकिन अभी भी मुझे ऐसा लग रहा था की रोहित कुछ छिपा रहा है.
मैं घर पहुंचा ही था की रोहित का फिर से फ़ोन आया......
हेल्लो! अब क्या हुआ,
कुछ नहीं, मैं घर जा रहा हूँ,
क्या!!! अचानक तुझे ये क्या हो गया.....
खैर अब जा ही रहे हो तो ठीक है पर आने के बाद फ़ोन जरूर कर लेना.
ओके, मैं वापस आऊंगा तो फ़ोन करूँगा.
...........................................................................
आज पूरे ५ दिन हो गए रोहित का कोई फ़ोन नहीं आया और कोई दूसरा नंबर भी मेरे पास नहीं है.
मुझसे रहा नहीं गया, मैं उसके रूम पर पहुँच गया.
बगल वालों से पूछने के बाद जो मुझे पता चला उससे तो मेरे होस ही उड़ गए
लेकिन ये सब कैसे हो गया ...
मुझे भी पता नहीं, पोलिस वाले आये थे उन्हीं से पता चला.
कह रहे थे की किसी आदमीं का उसने खून कर दिया है.
किसका?????
कोई था उसके घर में, शायद उसकी माँ ने दूसरी सादी की थी.
अब मुझे सारी बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी.....की रोहित क्या छिपा रहा था!!
थोड़ी देर मैंने उससे बात की फिर वापस चला आया.
पर मन ही मन में, मैं ये सोचता रहा की आखिर रोहित ने.....?
क्या बात हो सकती है....
भगवान इस संसार मैं सबको एक जैसा ही भेजते है पर समय और परिस्थितयां उसकों और लोगों से अलग कर देती हैं" ...
यहाँ तक की वह अपना सही वजूद भी खो बैड़ता है.
चलिए अब मैं आप को वहां ले चलता हूँ जहाँ मैंने अपनी भावनाओं और दिल की पीड़ा को उलझते हुए देखा है.........
क्या यार तुम तो मेरे रूम का रास्ता ही भूल गए हो....
अरे तेज ...चलो अच्छा हुआ तुम आ गए, और सुना क्या हाल है ....
मैं क्या सुनाऊँ....तू ही आज कल नजर नहीं आता है,
कोई बात है क्या ? आज कल तुम थोडा उदास रहते हो....कुछ हुआ है क्या..
नहीं यार थोडा फॅमिली प्रोब्लम है
फिर भी ..."तुम तो जानते ही हो की पिता जी के न रहने से हमें कितनी मुस्किलों का सामना करना पड़ रहा है"
मैं तुम्हारी प्रोब्लम्स को समझ सकता हूँ पर ऐसे अकेले-अकेले रहने से तो कोई काम नहीं हो सकता है
बोलो मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए ......
कोई बात नहीं यार जब जरुरत पड़ेगी तो बोलूँगा ..
हाँ पर बोल देना, कोई परेशानी वाली बात नहीं है,
इतना कहने के बाद मैंने रोहित की दी हुई चाय की आखरी चुस्की ली और चलने के लिए इजाजत मांगी ...
दुसरे दिन.....सुबह-सुबह मेरे फ़ोन की घंटी बजी, मैंने मोबाइल उठाया,
रोहित कालिंग...
हाँ!!सुबह-सुबह...
अरे यार तुम घर कब जा रहे हो...
अगले महीने..क्यों क्या हुआ?
कुछ पैसे ला सकते हो मेरे घर से,
हाँ क्यों नहीं..
२ हजार, मैंने माँ से बोले दिया है; वो तुम्हे दे देंगी..
ओके!! यार मैं ले आऊंगा लेकिन अभी जरूरत हो तो बोलो...
नहीं अभी तो मेरे पास हैं
चलो ठीक है
बाय-बाय
"रोहित की आवाज कुछ भारी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे कुछ छिपा रहा हो ...
लकिन अब किसी के मन की बात तो समझी नहीं जा सकती "..
यह सोचते सोचते मैं फिर से सो गया....अब इतवार को तो कोई उठने की जल्दी नहीं होती है ..
...........................................................
अरे जल्दी करो नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी..
हाँ आ रहा हूँ २ मिनट
हमेशा की तरह इस बार भी मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ ही घर जा रहा था ....
बातों-बातों मैं समय का कुछ पता नहीं चला, ऐसा लगा जैसे हम ट्रेन से उड़ कर घर पहुँच गए हों.
घर पहुचने पर हमें उसी तरह की ख़ुशी मिलती है जैसे की किसी फिल्म निर्माता की पहली फिल्म हिट होने पर....
अगले दिन में रोहित के घर गया
घंटी बजाई .....दरवाजा खुला तो सामने ४० साल का एक आदमी खड़ा था.
मैंने उसको अपने यहाँ आने का कारण बताया...
उसने मुझे बाहर रुकने के लिए बोला...?
"अगले पल मेरे हाथ में २००० रूपये थे. शायद मेरे आने के बारे में उसे सब कुछ पता था."
वापस आने पर मैं सबसे पहले में रोहित के घर गया
रोहित तुमने मुझे उस बार भी कुछ नहीं बताया....
अब यार कुछ खास बात होती तो मैं जरूर बताता
ओके! यार अब मैं चलता हूँ
थैंक्स यार घर से पैसे लाने के लिए
नो प्रोब्लम, कोई और काम हो तो बोल देना
इतना कहकर मैं चल दिया. लेकिन अभी भी मुझे ऐसा लग रहा था की रोहित कुछ छिपा रहा है.
मैं घर पहुंचा ही था की रोहित का फिर से फ़ोन आया......
हेल्लो! अब क्या हुआ,
कुछ नहीं, मैं घर जा रहा हूँ,
क्या!!! अचानक तुझे ये क्या हो गया.....
खैर अब जा ही रहे हो तो ठीक है पर आने के बाद फ़ोन जरूर कर लेना.
ओके, मैं वापस आऊंगा तो फ़ोन करूँगा.
...........................................................................
आज पूरे ५ दिन हो गए रोहित का कोई फ़ोन नहीं आया और कोई दूसरा नंबर भी मेरे पास नहीं है.
मुझसे रहा नहीं गया, मैं उसके रूम पर पहुँच गया.
बगल वालों से पूछने के बाद जो मुझे पता चला उससे तो मेरे होस ही उड़ गए
लेकिन ये सब कैसे हो गया ...
मुझे भी पता नहीं, पोलिस वाले आये थे उन्हीं से पता चला.
कह रहे थे की किसी आदमीं का उसने खून कर दिया है.
किसका?????
कोई था उसके घर में, शायद उसकी माँ ने दूसरी सादी की थी.
अब मुझे सारी बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी.....की रोहित क्या छिपा रहा था!!
थोड़ी देर मैंने उससे बात की फिर वापस चला आया.
पर मन ही मन में, मैं ये सोचता रहा की आखिर रोहित ने.....?
क्या बात हो सकती है....
"खैर जिंदगी तो चलती ही रहती है
लोग मिलते हैं हवा की तरहं
और फिर उड़ जाते हैं धूल की तरहं....
हमें आगे चलना है, ठीक उसी तरहं जैसे हर सावन में बुलबुल अपना नया घोसला बनाती है."
चलो मैं अब आप से यही कह सकता हूँ की इंतज़ार करिए अगली कड़ी का.......
दीपक
सभी अपनी जिंदगी को इसी उम्मीद के साथ जीते हैं की कभी न कभी वो दिन ज़रूर आएगा जब उनके मन की हर इच्छा पूरी होगी............
शाम का समय था सूरज की लालिमा अपने घर वापस जा रही थी और उसी के साथ-साथ मैं भी, तभी पीछे से किसी ने आवाज़ दी सर...मैं रुक गया और पीछे मुड़ा तो देखा मेरे ही उम्र का एक छोटे कद का लड़का जिसके पास एक काले रंग का झोला था जिसे उसने अपने लम्बे सीने के छोटे कंधे पर लटका रक्खा था.
मैंने जवाब दिया ....सर आप ने मुझे पहचाना नहीं, मैं आप का जूनियर....
दीपक तुम! काफी बदल गए हो पहचान नहीं पाया, यहाँ कैसे?
सर मुझे यहाँ दिल्ली में जॉब मिल गयी है...
कहाँ ज्वाइन किया?
मेट्रो रेल कॉरपोरेशन मैं एस अ टेक्नीकल इंजिनियर
दीपक तुम! काफी बदल गए हो पहचान नहीं पाया, यहाँ कैसे?
सर मुझे यहाँ दिल्ली में जॉब मिल गयी है...
कहाँ ज्वाइन किया?
मेट्रो रेल कॉरपोरेशन मैं एस अ टेक्नीकल इंजिनियर
बधाई हो भाई,
सर मैं शादी कर रहा हूँ, उसी का कार्ड देने आया हूँ
अरे वाह भाई! डबल बधाई, कब है शादी
१५ जुलाई को आना ज़रूर सर,
बिलकुल क्यों नहीं, शादी कहाँ कानपुर से कर रहे हो,
सर! आप को तो सब पता है लेकिन उनके घर वालों को मनाने मैं काफी मेहनत करनी पड़ी
अरे वाह भाई! डबल बधाई, कब है शादी
१५ जुलाई को आना ज़रूर सर,
बिलकुल क्यों नहीं, शादी कहाँ कानपुर से कर रहे हो,
सर! आप को तो सब पता है लेकिन उनके घर वालों को मनाने मैं काफी मेहनत करनी पड़ी
चलो एक बार फिर बधाई.......अगले दिन जब में लैब मैं पहुंचा तो रोज की तरह सर्वेश जी के साथ चाय पीने चला गया
एक चाय मेरे लिये भी बोल देनादो चाय देना....जी!
सर्वेश जी मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिये, सर दे देंगे क्या?
कहाँ जाना है, देख ले आज कल सर थोड़ा मूड मैं नही हैं
पूछता हूँ देखो क्या कहते हैं
पर जाना कहाँ है....
एक दोस्त की शादी है कानपुर में,
क्या बात है आज कल खुब मस्ती हो रही है;
अच्छा दोस्त है.......
चल भाई लैब मैं चलते हैं, मुझे कुछ काम है....
एक चाय मेरे लिये भी बोल देनादो चाय देना....जी!
सर्वेश जी मुझे दो दिन की छुट्टी चाहिये, सर दे देंगे क्या?
कहाँ जाना है, देख ले आज कल सर थोड़ा मूड मैं नही हैं
पूछता हूँ देखो क्या कहते हैं
पर जाना कहाँ है....
एक दोस्त की शादी है कानपुर में,
क्या बात है आज कल खुब मस्ती हो रही है;
अच्छा दोस्त है.......
चल भाई लैब मैं चलते हैं, मुझे कुछ काम है....
लैब के अंदर जाते ही मैंने देखा की सर अपनी बेटी से फ़ोन पर बात कर रहे थे और बहुत खुश नजर आ रहे थे. सर से छुट्टी मांगने का इससे अच्छा मौका और कोई नहीं होता था, मैं उनके फ़ोन रखने का इंतज़ार करता रहा और जैसे सर ने फ़ोन रखा मैं झट से उनके पास पहुँच गया. अब क्या था मेरे कहने की देर थी की सर ने हाँ बोल दी. मैं बहुत खुश हुआ और सर को थैंक्स बोल कर वापस आ गया. तब तक सर्वेश जी भी आ गए.
सर्वेश जी मिल गयी छुट्टी मुझे सर ने हाँ कह दिया,
जा भाई सर तेरे पर तो कुछ जादा ही महेरबान हैं...
मुझे भी यही लग रहा है, उम्मीद नहीं थी
जा भाई सर तेरे पर तो कुछ जादा ही महेरबान हैं...
मुझे भी यही लग रहा है, उम्मीद नहीं थी
फिर मैंने सोचा की लाओ ज्योत्सना जी को भी लगे हाथ छुट्टी के बारे में बता देते हैं, मैंने अपनी नजर इधर उधर घुमाई और उनको उसी कुर्सी पर बैठे हुए पाया जहाँ वो अक्सर बैठा करती थीं. फिर मैंने सर की तरफ देखा और फिर घडी के....बस अब उनके जाने में ५ मिनट बचा है....जैसे ही सर गए मैं तुरंत ही ज्योत्सना जी के बगल वाली कुर्सी पर जा कर बैठ गया. शायद आज ही ज्योत्सना ने अपना डेस्कटॉप इमेज बदला था.
ये क्या लगा रक्खा है डेस्कटॉप पर गोल सा.....पता है जिंदगी भी इसी तरह गोल है,
ऐसी बात नहीं है, जिंदगी अच्छी है,
बशर्ते आप उसे सकारात्मक लें......
मुझे आप से एक बात बोलनी थी,
क्या?
मैं दो दिन के लिए घर जा रहा हूँ
सर से पूछा है या नहीं...पूछ लो पहले
हाँ पूछा, सर ने हाँ कह दी.....
ठीक है जल्दी आना iNOS वाला काम भी खत्म करना है,
ये क्या लगा रक्खा है डेस्कटॉप पर गोल सा.....पता है जिंदगी भी इसी तरह गोल है,
ऐसी बात नहीं है, जिंदगी अच्छी है,
बशर्ते आप उसे सकारात्मक लें......
मुझे आप से एक बात बोलनी थी,
क्या?
मैं दो दिन के लिए घर जा रहा हूँ
सर से पूछा है या नहीं...पूछ लो पहले
हाँ पूछा, सर ने हाँ कह दी.....
ठीक है जल्दी आना iNOS वाला काम भी खत्म करना है,
और यह बता कर मैं अपनी टेबल पर या ऐसा कहो की सर के बाँटने के बाद बची कुची टेबल पर जो सर्वेश जी के कहने से थोड़ा बड़ी हो गयी थी उस पर काम करने चला गया, इतने में शिल्पी जी भी अपने टेबल पर काम करने आ गयीं जो की मेरे ठीक सामने ही थी...बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा....
आप को लखनऊ से कुछ मंगाना है क्या?
कब जा रहे हो
कल
हाँ वहां चिकन की साड़ी अच्छी मिलती है पर मुझे कुछ मंगाना नहीं है,
ठीक है बाद में कुछ मत कहना....
कब जा रहे हो
कल
हाँ वहां चिकन की साड़ी अच्छी मिलती है पर मुझे कुछ मंगाना नहीं है,
ठीक है बाद में कुछ मत कहना....
ट्रेन से सफ़र करते समय मेरी कुछ न कुछ लिखते रहने की आदत थी.......
"हैरान हूँ मैं शब्द की मार से.....
तोड़ता हूँ मरोड़ता हूँ शब्द को,
शब्द की राह और उसकी शाज को!
निकालता हूँ और सुनता हूँ शब्द को,
बिखेरता हूँ और पकड़ता हूँ शब्द को..
शब्द ही बनाते हैं धुन और सरगम,
जोड़ते और तोड़ते भी हैं दिल! ये शब्द ...
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से....."
तोड़ता हूँ मरोड़ता हूँ शब्द को,
शब्द की राह और उसकी शाज को!
निकालता हूँ और सुनता हूँ शब्द को,
बिखेरता हूँ और पकड़ता हूँ शब्द को..
शब्द ही बनाते हैं धुन और सरगम,
जोड़ते और तोड़ते भी हैं दिल! ये शब्द ...
हैरान हूँ मैं शब्द की मार से....."
कानपुर आने के इंतज़ार में कुछ इस तरह मैंने समय को अपने साथ-साथ चलने दिया और बार-बार खिड़की से बहर देखता रहा. कानपुर आते ही मेरे पैर सीधे २३-शादी घर स्टेशन रोड की तरफ चल दिए जो की स्टेशन से मुश्किल से आधा किलोमीटर की दूरी पर था. शादी घर पंहुचा तो देखा बहुत अंधेरा था वहां, मैंने किसी से पूछा......भाई साहब शादी घर यही है
हाँ ठीक जगह पर आये हैं आप, दीपक की शादी मैं आये हैं क्या?हाँ..
चलिए अंदर चलिए मैं उनका चाचा हूँ, लाइट चली गयी है बस अभी आती ही होगी....
तब तक कहीं से आवाज़ आई....
अरे तेज सर आप कब आये..
अभी-अभी पहुंचा हूँ, इतनी देर मैं लाइट भी आ गयी,
इन लोगों से मिलये ये सब मेरे दोस्त हैं अब आप को इन्ही के साथ गप्पे सप्पे करनी हैं मैं तो २ बजे के बाद ही आप को मिलुंगा.....
जा भाई तू तो आज दूल्हा है और हम बाराती, मिलते हैं २ बजे के बाद.....
सब के साथ खाना खाया और उसकी शादी को देखता रहा
काफी रोमांचित कर देने वाले छड़ थे वो.........!!!!!
मैंने घड़ी देखी २ बज कर १५ मिनट हुए थे की दीपक ने अपने आने का वादा पूरा किया
उसने सबको अपनी तरफ बुला लिया और बोला की अब तेज सर हम लोगों को कुछ सुनाने जा रहे हैं, मैं बोला क्या यार गाना वाना मुझे नहीं आता....
सर मैं तो आप की लिखी हुई कुछ लाइनें सुनना चाहता हूँ
अरे यार यहाँ, तब तक सभी लोगों ने दीपक की हाँ में हाँ मिला दिया और मैं मना न कर सका....
"सावन को आने दो पूछेंगे उससे,
क्या तुम्हें मेरे दर्द का ख्याल न रहा.......
वो भी पल थे जब वो साथ थे तुम साथ थे,सारे लमहे अपने थे उनकी हर बात महकती थी,
हवा भी उनके साथ चलती थी,और तुम ही इशारे से उनके आने की खबर दिया करते थे...
आज न ही वो लमहे अपने रहे;न ही तुमने उनके आने की खबर दी.....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!"
सर एक और.....................वो भी पल थे जब वो साथ थे तुम साथ थे,सारे लमहे अपने थे उनकी हर बात महकती थी,
हवा भी उनके साथ चलती थी,और तुम ही इशारे से उनके आने की खबर दिया करते थे...
आज न ही वो लमहे अपने रहे;न ही तुमने उनके आने की खबर दी.....
बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!"
सांसे गहरी, दिल प्यासा और मन उदास है,
...सब कुछ होने के बाद भी!!
अब ना होगी इन आँखों में इंतज़ार की कहानी,
और ना ही होगी मुस्कराहट में इकरार की कहानी,
दब जाया करेंगी मेरी ऑंखें आसुओं के साथ.....
जब मैं देखूँगा अपने हाथों की इन लकीरों को,
और खोजूंगा उनके आने की खबर....
...सब कुछ होने के बाद भी!!
अब ना होगी इन आँखों में इंतज़ार की कहानी,
और ना ही होगी मुस्कराहट में इकरार की कहानी,
दब जाया करेंगी मेरी ऑंखें आसुओं के साथ.....
जब मैं देखूँगा अपने हाथों की इन लकीरों को,
और खोजूंगा उनके आने की खबर....
बस भाई इससे जादा अब मैं नहीं सुना सकता.........................
अब मुझे नींद आ रही है मैं तो सोने जा रहा हूँ.............
सुबह हुई तो देखा शादी की सजावट को इसतरह से हटाया जा रहा था जैसे विधवा की मांग से सिंदूर, कुछ भी नहीं बचा थासिवाए जूठे पड़े प्लास्टिक के ग्लास और उनके साथ पेप्सी की बोतलों के. गली के कुत्तों को तो जैसे महीने भर का खाना एकसाथ ही मिल गया हो. मैंने नाश्ता किया, दीपक को शादी की बधाई दी और चंपत हो बना. शादी के बाद जितना जल्दी होउतना जल्दी निकल लेना चाहिए नहीं तो कुछ देर बाद लोग पहचानना ही बंद कर देते हैं.................
अगर कहीं आप भूल से भी सुबह ९:१५ पर आइ. जी. आइ. बी. पहुँच जाएं तो सर आप को लिफ्ट के पास ही मिल जाएँगेऔर पूरी राम कहानी लिफ्ट के अंदर ही हो जायेगी. उस दिन वापस लौटने पर मेरे साथ यही हुआ, सारी राम कहानी कब, किसको, कहाँ, कौन, क्यों ........मैं लिफ्ट के एक कोने मैं खड़े होकर उनके हर बात का जवाब देता चला गया. अचानकलिफ्ट खुली और हम लिफ्ट से बाहर आ गए फिर वो अपने रास्ते मैं अपने ऐसा लग रहा था जैसे हम पहली बार मिलें हों.
आ गया तू वापस शादी कैसी रही...
हाँ सर, मस्त थी! चाय पीने चलना है
चल चलते हैं...
दूसरे दिन: मैं लैब में काम कर रहा था दिन के २ बजे थे की अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी....
दीपक कॉलिंग....
हेलो! हाँ कैसा है तू,
सर मैं कल दिल्ली आ रहा हूँ...
इतनी जल्दी अभी तो दो दिन ही हुए हैं तेरी शादी को,
हाँ वो तो ठीक है पर छुट्टी जादा नहीं मिली थी..
ओके दिल्ली पहुँचना तो एक बार और फ़ोन कर लेना फिर पार्टी करते हैं...
बिलकुल सर...बाय
अगले दिन सर लैब में नहीं थे और ऐसा लग रह था की आज सबके पर निकल आये हों, सभी अपनी मर्ज़ी वाले काम कर रहेथे सिवाए राज शेख़र के कोंय्की वो तो रोज ही अपनी मर्ज़ी वाले काम करता था. राजन को तो जैसे दुनिया से कोई मतलबही नहीं था पर जब सनोबर का नाम आता था तो थोड़ा खुश हो जाता था. अमरेन्द्र रोज की तरह उस दिन भी किसी कोगिफ्ट देने की तैयारी में था, करता भी क्या गिफ्ट से ही अपना काम चला लिया करता था. एक तरफ जीतेन्द्र पी. सी. आर. लगा रहा था और शिल्पी जी उनके बगल मैं खड़ी थीं, ये भाई साहब भी सर के न रहने पर ही नजर आते थे. अमित औरममता जी इन सब मौकों पर देर मैं आया करते थे. ज्योत्सना उस दिन फैअक्स रूम मैं काम कर रही थीं, शायद वहां जादाशान्ती होती थी. मैं उनके कोम्पुटर पर काफ़ी विथ किशोर का मजा ले रहा था.जिंदगी एक सफ़र है सुहाना, कल क्या हो किसने जाना.........
सभी अपने लय मैं खोये हुए थे की इतने मैं सर्वेश जी का लैब में प्रवेश हुआ......
क्या हो रहा है कुछ बाहर की भी खबर है...अगली साँस लिए बिना बोले एन डी टी वी पर ब्रेकिंग न्यूज़ आ रही है, चांदनीचौक मैं बम ब्लास्ट हो गया...पहले तो किसी को कुछ समझ में नहीं आया पर अगले ही पल सभी ने सर्वेश को घेर लिया औरपूछने लगे...
क्या हुआ क्या हुआ !...डिटेल में बताओ...
हे! भगवान ये क्या हो गया..
कितने लोग मरे?
ये तो पता नहीं पर काफी लोग मरे हैं,
पता नहीं ये सब कोन करता है, क्या मिलता है उन्हें...
कितने लोग मरे?
ये तो पता नहीं पर काफी लोग मरे हैं,
पता नहीं ये सब कोन करता है, क्या मिलता है उन्हें...
मेरी तो जैसे सांसे ही रुक गयी हों. ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे एक बड़ा सा पत्थर दे मारा हो. कब क्या हो जय किसी कोकुछ पता नहीं....सभी अपने जगह पर दोबारा चले गए पर १५ मिनट पहले वाली खुशी जाती रही......
रात भर मुझे नींद नहीं आई. सुबह होते ही सबसे पहले अखबार को उठाया.....
रात भर मुझे नींद नहीं आई. सुबह होते ही सबसे पहले अखबार को उठाया.....
दिल्ली दहली ९८ मरे १०० से जादा घायल....
हर जगह लाशें और खून लेकिन प्रशासन को कोई फ़िक्र नहीं
मेरे पैर के नीचे से धरती तब फिसली जब मेरी नजर दूसरे पेज पर छपी फोटो पर पड़ी....
अरे ये तो दीपक है..ऐसा नहीं हो सकता. मैंने मोबाइल से उसके शादी की ली गयी फोटो से उसका फोटो मिलाया....
शक यकीन में बदल गया. मेरे हात पैर कांपने लगे
किसी तरह से दीपक का फ़ोन नंबर खोजा..
पता नहीं मिलेगा भी या नहीं, चलो कोशिस करके देखते हैं...
हेलो!! दूसरे तरह से एक बहुत ही दुखी और गंभीर आवाज़ आई...
आप कौन..
मैं प्रदीप...
थोड़ा रुकते हुए मैंने पूछा.. दीपक?
आपने ब्लास्ट के बारे में तो सुना ही होगा, वह......
मैंने तुरन्त उसका पता नोट किया और उसके घर जाने के लिए ऑटो बुलाया....
ऑटो रुकते ही सबसे पहले दीपक के नंबर पर फ़ोन किया..
आप कहाँ हैं..अच्छा मैं आ रहा हूँ आप वहीँ रुकिए,
उसके घर जाकर देखा की सभी कानपुर जाने की तैयारी में थे. सभी में दीपक की पत्नी शबीना भी थी. एक ही बार मिला थामैं..मुस्लिम होते हुए भी उसने हिन्दू लड़के से सदी की, कम ही लोग कर पाते हैं ऐसा प्यार जैसा दीपक-शबीना ने किया परअब सब कुछ बिखर गया था. ना भगवान का दया आई ना ही ख़ुदा को...क्यों किया ऐसा इसका जवाब किसी के पास नहींथा. किसी को मैंने यह कहते हुए भी सुना..मुस्लिम से शादी की थी नतीजा सामने है... मेरा दिल चीख-चीख कर यही कहरह था, क्यों दो प्यार करने वाले नहीं मिल पाए...आदमी से गुनाह होते देखा था पर आज तो भगवान से भी गुनाह हुआ है.
हर जगह लाशें और खून लेकिन प्रशासन को कोई फ़िक्र नहीं
मेरे पैर के नीचे से धरती तब फिसली जब मेरी नजर दूसरे पेज पर छपी फोटो पर पड़ी....
अरे ये तो दीपक है..ऐसा नहीं हो सकता. मैंने मोबाइल से उसके शादी की ली गयी फोटो से उसका फोटो मिलाया....
शक यकीन में बदल गया. मेरे हात पैर कांपने लगे
किसी तरह से दीपक का फ़ोन नंबर खोजा..
पता नहीं मिलेगा भी या नहीं, चलो कोशिस करके देखते हैं...
हेलो!! दूसरे तरह से एक बहुत ही दुखी और गंभीर आवाज़ आई...
आप कौन..
मैं प्रदीप...
थोड़ा रुकते हुए मैंने पूछा.. दीपक?
आपने ब्लास्ट के बारे में तो सुना ही होगा, वह......
मैंने तुरन्त उसका पता नोट किया और उसके घर जाने के लिए ऑटो बुलाया....
ऑटो रुकते ही सबसे पहले दीपक के नंबर पर फ़ोन किया..
आप कहाँ हैं..अच्छा मैं आ रहा हूँ आप वहीँ रुकिए,
उसके घर जाकर देखा की सभी कानपुर जाने की तैयारी में थे. सभी में दीपक की पत्नी शबीना भी थी. एक ही बार मिला थामैं..मुस्लिम होते हुए भी उसने हिन्दू लड़के से सदी की, कम ही लोग कर पाते हैं ऐसा प्यार जैसा दीपक-शबीना ने किया परअब सब कुछ बिखर गया था. ना भगवान का दया आई ना ही ख़ुदा को...क्यों किया ऐसा इसका जवाब किसी के पास नहींथा. किसी को मैंने यह कहते हुए भी सुना..मुस्लिम से शादी की थी नतीजा सामने है... मेरा दिल चीख-चीख कर यही कहरह था, क्यों दो प्यार करने वाले नहीं मिल पाए...आदमी से गुनाह होते देखा था पर आज तो भगवान से भी गुनाह हुआ है.
मुंह मोड़ लिया मेरी जिंदगी से,
बुझ गया मेरे जीवन का दीपक!
छोड़ दिया मुझे अकेले, मैं कैसे जिंयुंगी तेरे बिना..
किसे कहुँगी अपना, कौन होगा मेरा....
बुझ गया मेरे जीवन का दीपक!
छोड़ दिया मुझे अकेले, मैं कैसे जिंयुंगी तेरे बिना..
किसे कहुँगी अपना, कौन होगा मेरा....
कुछ ऐसा ही शबीना सोच रही होगी...
सबके चले जाने के बाद मैं भी सीधे लैब चला आया. धीरे-धीरे समय ने रफ़्तार पकड़ ली.....
खोने को तो इस जिंदगी मैं बहुत कुछ होता है पर पाने की लिए बहुत कम फिर दिल क्यों भागता रहता हैअंजानरास्तों पर. कोई नहीं जनता और ना ही जानने की कोशिश करता है.......
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