Sunday, August 28, 2011

नीलम

अगर आज दीपक से कोई ये पूछे की अन्ना हरे या जीते तो शायद उसके पास कोई जवाब ना होगा पर आजादी की इस दूसरी लडाई ने उसको कहीं का ना छोड़ा, बचा तो सिर्फ खालीपन पर भीगी आँखें | सुबह के १० बजे थे जब नीलम की तबियत खराब हुई, दर्द इतना बुरा था की उसको तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ा |  
आपातकालीन विभाग में दाखिल करना पड़ेगा हालत कुछ ठीक नहीं है यह कहकर डॉक्टर ने दीपक को आगे की तरफ इशारा किया. दीपक ने भर्ती की सारी प्रक्रिया पूरी की और डॉक्टर के आने का इंतज़ार करने लगा | अगले पल डॉक्टर आये और रक्त और पेसाब की जांच लिखकर दोबारा आने को बोलकर चले गए |
नीलम की हालत और खराब हो रही थी वह रह-रह कर दीपक-दीपक कर रही थी, इतने में डॉक्टर जांच की रिपोर्ट लेकर अन्दर दाखिल हुए और दीपक को ई. सी. जी. कराने को बोलकर चले गए. दीपक को कुछ समझ नहीं आ रहा था की डॉक्टर ने ई. सी. जी. के लिए क्यों बोला है, खैर वह डॉक्टर के कहे अनुसार सारी प्रक्रिया से गुजरने लगा |
दिन के १२ बज थे जब उसे रिपोर्ट मिली...........रिपोर्ट लेकर वो सीधे डॉक्टर के पास गया .....
सर जी कोई घबराने वाली बात तो नहीं है, डॉक्टर थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले बड़े डॉक्टर का इन्जार करिए वो आते ही होंगे राम लीला मैदान से | दीपक हाँ में हाँ मिलाकर नीलम के पास जाकर बैठ गया, इतने में एक दूसरा डॉक्टर आया और नीलम को देखने लगा, दीपक ने पूछा बड़े डॉक्टर कब आयेंगे...कोई जवाब ना आया |
उधर नीलम की तबियत और बिगड़ रही थी, दीपक भी रह-रह कर परेशान हो रहा था और भगवान् को याद कर रहा था पर बड़े डॉक्टर के आने की कोई खबर ना थी.
सहसा नीलम जोर-जोर से सांसे लेने लगी ऐसा लग रहा था मानों अभी उसकी सांसे छूट जाएगी, आनन्-फानन में पास खड़ी नर्स ने डॉक्टर को फ़ोन लगाया पर कुछ संतोष जनक उत्तर ना मिला, दीपक दौड़ कर डॉक्टर कच्छ में गया और मदत के लिए प्रार्थना करने लगा पर  डॉक्टर ने बोला ये हार्ट प्रोबलम का केस है मैं नहीं देख सकता आप को हार्ट स्पेस्लिस्ट (बड़े डॉक्टर) का इंतज़ार करना होगा | दीपक भागता हुआ नीलम के पास आया वो बेसुध पड़ी थी उसने हाथ हिलाया पर नीलम को कुछ महसूस ना हुआ वह भाग कर फिर से डॉक्टर के पास गया | 
डॉक्टर के आने के बाद दीपक ने जो कुछ भी अपने कानों से सुना उसपर वह विश्वास नहीं कर पा रहा था की उसके जीवन की नीलम इन्द्रलीन हो गयी है और अब कभी नहीं आएगी |
दीपक ने हिम्मत बांधा और किस्मत की दुहाई मंजूर करते हुए नीलम को सर उठा कर अपने पैरों पर रख लिया और फिर टूट कर रोने लगा |

अभी ही तो लिए थे फेरे अभी से क्यों गए,  
हुई क्या खता जो तुम मुझसे हुए इतने परे |
अब कौन मुझे अपनी जामुनी बाँहों में डालेगा,
और करेगा रक्तिम नीलमी बरसात आंचल तले |
  
थोड़ी देर बाद बड़े डॉक्टर भी आ गए पर अब कोई फ़ायदा ना था क्योंकि नीलम तो अब बेचमक होकर अपनी जलते दीपक में विहीन हो चुकी थी | दीपक भी अपना प्रकाश खोने को है, ऐसा लग रहा की मानों यहाँ से आज एक नहीं दो सांसे अपना पथ परिवर्तन करने वाली हैं |
दीपक ने भले ही आजादी की दूसरी लडाई राम लीला मैदान से ना लड़ी हो पर वो उस मैदान का गवाह जरूर बनेगा |
 

Monday, December 6, 2010

मेडिकल प्रवेश परीछा

आदमी अपने जीवन में ऐसे बहुत सारे आयामों से गुजरता है जहाँ वह अपने आप को अकेला पता है. कुछ इसी तरह आज प्रताप महशूश कर रहा है. ५ साल पहले जब उसने मेडिकल की तैयारी शुरु की थी तब उसे नहीं पता था की वह कभी ये दिन भी देखेगा पर प्रताप को देखना पड़ा, कारण उसे भी पता नहीं था.
लगातार प्रयास के बाद भी प्रताप का चयन एम. बी. बी. स मेडिकल प्रवेश परीछा में नहीं हुआ यह उसका ५ वां साल था. प्रताप ने जब मेडिकल प्रवेश की लिए तयारी शुरु की थी तब उसके हाथ में १० + २ डिग्री थी और आज भी वही डिग्री. ऐसा नहीं था की प्रताप पढने में होशियार नहीं था पर किस्मत में जो लिखा था वही हुआ. लगातार 4 वर्षों तक उसका चयन बी. च. एम्. एस और बी. वी. स. सी  में हुआ पर जनरल कोटे में सीट कम होने से उसे एम. बी. बी. स नहीं मिल पा रहा था, कुछ, २-३ नंबर कम रह जा रहे थे. प्रताप ने एम. बी. बी. स करने के धुन में किसी में भी दाखिला नहीं लिया. यह उसका ५ साल था और उसने अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
आज ही मेडिकल का रिजल्ट आने वाला था, प्रताप को उसका बेताबी से इंतज़ार था पर जब उसने सुबह अखबार देखा तो उसके होश उड़ गये. मेडिकल का रिजल्ट रोक दिया गाया था कारण पेपर लीक होने का मामला था. प्रताप को तो ऐसा लग रहा था जैसे की अभी वह धडाम से जमीन पर गिर पड़ेगा. वैसे पेपर लीक होना कोई नई बात नहीं थी पर इस बार पूराने सारे रिकॉर्ड टूट गये थे, ५०-५० हज़ार में कोचिंग वालों ने पेपर बेचे थे कुछ टेस्ट सिरीज के नाम पर तो कुछ गेस पेपर के नाम पर. अब कोई कितना भी मेहनत कर ले क्या फर्क पड़ता है चयन तो उन्ही का होगा जिनके पास ५० हजार हैं. 
प्रताप बहुत टूट गाया था और उसमें कुछ भी सुनने और समझने की ताकत नहीं बची थी. मायूस होकर जब वह घर पहुंचा तो घर वाले उसे ही गली दे रहे थे की ५ साल से तयारी कर रहे थे तुम होना होता तो हो गाया होता अब आगे क्या करने का विचार है. सभी घर वालों ने उससे मुहं मोड़ लिया की कहीं ऐसा ना हो की प्रताप को फिर से एक साल के लिए पैसे देने पड़े.
अब प्रताप इस मोड़ पर है की उसके पास सिर्फ १०+२ की डिग्री है जिसके बल पर उसे कहीं नौकरी नहीं मिल सकती.
यह कहानी कितने और लोगों की होगी कहना मुस्किल होगा पर इतना तो साफ़ है की आजाद भारत को एक बार फिर से आजाद होना होगा इन माफियाओं, सरगनों और दबंगों से...........

तेज प्रताप सिंह "तेज"

Thursday, August 19, 2010

सबसे छोटी जाति किशान

आप सभी लोगों से कभी न कभी ये जरूर पूछा गया होगा की आप क्या करते हैं या आप का बेटा क्या करता है. आज मोहन भी इस सवाल से बच नहीं पाया या यह कहिये की मोहन से जान बूझ कर ये सवाल पूछा गया. मोहन अपने एक मित्र रोहन की शादी में गया था. सभी अपने-अपने तरीके से शादी का आनन्द ले रहे थे तभी अचानक एक आवाज आयी...आरे भाई अन्दर आ जाईये वरमाला पड़ने वाली है. 
"यार मोहन चलो हम भी चलते हैं 
हाँ चलते हैं......"
यह कहकर मोहन अपने उस नए बने मित्र के साथ वरमाला मंच के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया.
दोनों ने वरमाला का रश्म निभाया फिर जाकर रोहन के घर वालों के साथ बातें करने लगे.
"रोहन बेटा इनसे मिलो ये हैं मिश्रा जी...जानते हो इनका बेटा डॉक्टर हो गया है.
ये तो बहुत अच्छी बात है..अब तो आप बहुत खुश होंगे..मोहन बोला 
हाँ भाई मेरे लड़के ने तो मेरा नाम रोशन कर दिया."
मोहन ने सहमती से सर हिलाया और फिर खाना लेने के लिए चला गया. थोड़ी देर बाद खाना लेकर जब वह लौटा तो वहां पर कुछ और लोग आकर खड़े हो गए थे.
नमस्ते अंकल..मोहन ने विनम्रता का परिचय दिया ????
हाँ नमस्ते बेटा कैसे हो.....!!!!
इतनी देर में रोहन भी वहां आ गया था...
भाई आप के बेटे ने तो वो काम किया है जो काबिले तारीफ है. आईएस बनना कोई मामूली बात तो नहीं हो सकती..
"बधाई हो बेटा......!!
हाँ इतना ही क्यों आप की बहू भी तो अब इंजीनियरिंग पूरा करेने वाली है.
सब आप लोगों की कृपा है...रोहन के पापा बोले"
मोहन भी सब की हाँ में हाँ मिला रहा था की तब तक किसी ने पूछ ही लिया 
"बेटा तुम क्या करते हो....??
थोडा चुप होते हुए बोला मैं तो..!!! कुछ नहीं घर पर ही खेती देखता हूँ.
अच्छा तो किसान हो"...कहीं से एक व्यंग्य भरी आवाज आयी.
"मोहन चुप रहा फिर बोला पता नहीं पर खेती करना मुझे अच्छा लगता है."
अब लोगों ने मोहन से थोडा बात करना कम कर दिया और धीरे-धीरे वहां से हटने लगे. 
उसको ऐसा लगने लगा जैसे अचानक वह अछूत हो गया हो. अब जादा देर मोहन से रुका न गया. मोहन तुरंत वहां से चल दिया पर वह इस बात को सोचता रहा की जब लोगों को यह पता था की मैं खेती करता हूँ तो फिर पूछा क्यों. 
जाति के आधार पर लोगों को बटते तो बहुत बार देखा था पर काम और नौकरी के आधार पर पहली बार ....वैसे भी हमारी जातियां काम के आधार पर ही बांटी गयी थीं पर आज आप इनका हाल तो देख ही रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब ये जातियां विलुप्त हो जाएगी और उनकी जगह नई जातियां आ जायेगी. तब आप को शायद मिश्रा जी, श्रीवास्तव जी, पंडित जी, ठाकुर जी कहकर न पुकारा जाये बल्कि डॉक्टर जी, इंजिनियर जी, मास्टर जी, पुलिश जी, वैज्ञानिक जी......कहकर पुकारा जाये और इनमें जो सबसे छोटी जाति होगी वो किशान होगी. 

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Friday, August 13, 2010

बटाई का धान

अन्दर से आवाज आई........
"अब तो खुश हो ना
हाँ काहे ना रही...तोका कोनो परेशानी है का
हाँ-हाँ अब तो खुश रहोगे ही..बटाई पर खेत जो मिल गाया है
भला हो राम सिंह का जिसने मुझे शहर में जाकर मजदूरी करने से बचाया"
स्वामी हर छमाही शहर जाता था और घर को चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता था पर इस बार राम सिंह ने उसे कुछ खेत बटाई पर देकर यहीं गाँव में रूककर खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया. पहले स्वामी थोडा सोंच में पड़ा पर अपनी धर्म पत्नी शोभा के समझाने से वह गाँव में रुक कर खेती करने के लिए तैयार हो गाया.
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 आज राम सिंह बहुत खुश था, होता क्यों नहीं लहलहाते धान के खेत उसकी ख़ुशी और मेहनत के गवाह थे.
"शोभा जानती हो!! धान बेचकर मैं क्या खरीदूंगा?
क्या, भला मैं भी तो जानू?
तेरे लिए गले का हार...मुझे तेरा खाली गला अच्छा नहीं लगता
रहने भी दो ये हार-वार, घर के छत से पानी टपक रहा है पहले वो बनवा लो....
हाँ वो भी बनवा दूंगा...
अच्छा-अच्छा ठीक है अब आकर खाना खा लो.."
स्वामी और शोभा दोनों आमने-सामने बैठकर एक ही थाली में खाने लगे. मन ही मन जैसे दोनों बातें कर रहे हों की फसल कटने के बाद पहले हम राम सिंह के पास जाकर उनका धन्यवाद देंगे की उनकी दया से ही अब हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं. राम सिंह जैसा आदमी अगर हर गाँव में हो जाये तो ना जाने कितने मजदूर शहर जाने से बच जाएँ. 
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काली रात थी..आसमान में बादल अपने उफान पर थे.
शोभा ये बादल तो लग रहा है आज कुछ गुल खिला के ही जायेंगे
अच्छा है ना फसल में पानी लग जाएगा
ठीक बोल रही है तू..अब दरवाजा बंद कर दो सोने चलते हैं
दोनों ने चादर अपने चेहरे पर डाली और सोने लगे लेकिन टपकती छत ने उनकी नीद तोड़ दी ...
शोभा ये बादल गये नहीं अभी तक
हाँ लग रहा है सही में कुछ गुल खिला कर जाएँगे
बंद कर अपनी ये मनहूस आवाज...शुभ-शुभ बोल!!!
दोनों के आँखों से नींद जा चुकी थी पर बादल अभी तक नहीं गये थे. एक-एक घडी कर के सुबह कब हो गयी दोनों को पता ही नहीं चला. अगले दिन तो वो कुछ बोलने लायक बचे ही नहीं.
जो फसल उनकी आँखों के सामने कल तक लहलहा रही थी, आज वह पानी में तैर रही थी, मानों इशारे से कह रही हो की मैं तुम्हारी जिंदगी में ख़ुशी ना ला सकी इसका मुझे बहुत दुःख है.
स्वामी के नशीब में तो जैसे शहर में जाकर मजदूरी करना ही लिखा है, बेकार में उसने थोड़ी दिन सपने देखे.
स्वामी ही क्यों और भी हैं जिनके सपने पानी में तैर रहे हैं और ना जाने कब तक तैरते रहेंगे.
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Saturday, August 7, 2010

लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं

.....................................................................................................................................................................आज ही इंजीनियरिंग कॉलेज का रिजल्ट आया था....
"बेटा मनोज तुम्हारे रिजल्ट का क्या हुआ?
हाँ पापा लिस्ट में दूसरा नंबर है, अच्छा कॉलेज मिल जायेगा
गुड, मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूँ.
वो तुम्हारे दोस्त सोनू का क्या हुआ ?
पापा उसको शायद कोई कॉलेज ना मिल पाए उसके नंबर बहुत कम हैं.
चलो कोई बात नहीं अगली बार शायद उसे भी कुछ अच्छा मिल जाये."
अगले दिन मनोज कॉलेज में दाखिला लेने पहुंचा तो उसे वहां सोनू के पापा भी मिल गये.
"हाँ बेटा मनोज कैसे हो...कैसा चल रहा है सब कुछ.
मैं अच्छा हूँ ...कॉलेज में दाखिला लेने आया हूँ 
बधाई हो..
पर आप यहाँ कैसे?
हाँ.. मैं भी सोनू का दाखिला कराने आया हूँ"
मनोज को तो बात समझ में नहीं आई कि आखिर सोनू को कैसे दाखिला मिल सकता है.
यही सोचता हुआ वह सोनू के पापा को नमस्ते करके अन्दर दाखिले के लिए चला गाया.
......................................................................................................................................................................
दाखिला लेकर मनोज जब घर वापस आया तो बहुत परेशान था ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने आप को कोश रहा हो कि इतना पढने का क्या फ़ायदा जब सोनू को बिना मेहनत किये दाखिला मिल रहा है. इतने में उसके पापा आ गये, उसको परेशान देखकर पूँछ पड़े क्या हुआ सब कुछ ठीक तो है ना. मनोज ने दुखी मन से सारी बात बताई.
ये तो गलत है..पर ये सब हुआ कैसे? कोई बात नहीं तुम इसकी चिन्ता मत करो और आगे के बारे में सोचो.
मनोज ने सहमती से सिर हिलाकर बाहर चला गाया.
अगले दिन मनोज घर से थोडा जल्दी निकला यह पता करने के लिए कि ये सब हुआ कैसे.
कुछ दोस्तों से मिलने के बाद जो उसे पता चला उससे तो वह और भी परेशान हो गाया.
मनोज के लिए ये कोई छोटी बात नहीं थी कि पैसे देकर कोई इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला कैसे ले सकता है. वह मन ही मन में सोंच रहा था कि मैंने इतनी पढाई कि इस कॉलेज में दाखिला मिल जाये, दिन रात एक कर दिया पर जब लोग यहाँ पैसे से दाखिला ले रहे हैं तो ये कॉलेज अच्छा कैसे हो सकता है. मनोज ने मन में ठान ली कि वह अब इस कॉलेज से अपना नाम हटा कर किसी और कॉलेज में जायेगा जो शायद देखने में अच्छा ना हो पर सरस्वती कि पूजा करता हो.
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सोनू के पापा आज बहुत गर्व से कह रहे हैं कि मेरा बेटा बी टेक कर रहा है और किसी के बेटे से कम नहीं है. लेकिन इस गर्व के पीछे एक कडवा सच ये है कि अगर सोनू को अपने बल पर बी टेक करना होता तो आज भी वो घर में बैठा होता. पैसे में इतनी ताकत कहाँ से आ गयी जो आज लोग सरस्वती को खरीद रहे हैं और देश में बने ना जाने कितने कॉलेज इन्हें बेच रहे हैं.
भ्रस्टाचार के लिए हम सरकार को कोसते हैं पर कभी अपने दामन को नहीं देखते. मुझे तो लग रहा है देश तो आगे बढ रहा है पर देश के लोग नहीं.

                             खून वो नहीं जो सिर्फ अपने बाजुओं में बहे
                          कभी धरती पर भी एक कतरा गिरा कर देखो।।

तेज प्रताप सिंह `तेज`

Wednesday, August 4, 2010

मेहनताना

रानी के बाबू जी दो महीना पहले ही सेना कि सेवा पूरी कर के आये थे. हर समय उन्हें रानी की शादी और अधूरा बना घर चिंता में डुबा देती थी. सवाल ये उठता है कि क्या सेना में इतना भी मेहनताना नहीं मिलता कि वो अपना घर बनाकर बेटी कि शादी कर सकें? जो देश के लिए अपना सर लिए घुमते हैं उनके पास ही सर छूपाने के लिए जगह नहीं होती...सवाल बहुत छोड़ा है पर जवाब शायद किसी कि पास नहीं है.
चिंता के इन्हीं कारणों ने सूबेदार राम सिंह को जल्दी पैसा बनाने के लिए मजबूर किया और वो बिना सोचे समझे जिले में एक ६ महीने पहले खुली ट्रेडिंग कंपनी में पैसा लगा दिया. कंपनी शेर बाजार में पैसा लगा कर पैसा बनाती थी. राम सिंह ने अपनी जिंदगी कि बची-कुची पूँजी कंपनी में लगा कर इस बात का इंतज़ार करने लगे कि १ साल बाद उन्हें इसका दुगना मिल जायेगा और वो अपने सारे काम आसानी से पूरा कर सकेंगे.
राम सिंह ने रानी कि शादी खोजना भी शुरु कर दिया......
बाबू जी मैं शादी नहीं करुँगी..मुझे आप के साथ ही रहना है
बेटी शादी तो करनी ही है, मुझे पता है कि तू मुझसे बहुत प्यार करती है पर मैं भी तो तुझसे उतना ही करता हूँ .
चलो बताओ इनमें से कोन सी फोटो तुम को सब से जादा पसंद है.
आप देख लो बाबू जी मुझे तो सब एक जैसे ही लगते हैं........!!!
हाँ अब तेरी पसंद भी तो देखनी पड़ेगी ना कि तुझे कौन पसंद है...अब अगर तेरी माँ आज हम लोगों के बीच होतीं तो ये फैसला भी उनके ऊपर छोड़ देते.. 
इतने में फ़ोन की घंटी बजी.....
हेलो...आप राम सिंह बोल रहे हैं
हाँ कहिये .....
वो शादी के बारें में बात करनी थी, कल हम लोग लड़की से मिलने आ रहे हैं अगर आप को कोई एतराज ना हो तो.
अरे इसमें एतराज करने वाली कोन सी बात है....आप लोग कल आ सकते हैं
रानी देखो कल तुमको एक लड़के वाले देखने आ रहे हैं तुम को कोई एतराज तो नहीं है.
नहीं बाबू जी ठीक है.............
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सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी, लोग आ चुके थे रानी को देखने. लड़के वालों ने सबसे पहले लड़की से मिलने की इच्छा जताई, रानी का जैसे कमरे में प्रवेश हुआ सबकी आँखे उसके चेहरे की और दौड़ पड़ीं. रानी सचमुच रूप की रानी थी कोई भी अपनी नजर ना हटा सका उसके चेहरे से, ऐसा लगा जैसे रानी किसी बच्चे की मासूमियत छुपाये शर्म के पालने में झूल रही हो.
रानी एक ही नजर में सबको पसंद आ गयी.....
अगले ही पल लड़के के माँ ने पूछा मेरा बेटा कैसा लगा?
रानी ने हाँ कर दिया.........अब क्या था जैसे ही रानी ने हाँ कहा शादी के बात पक्की होने लगी.
राम सिंह ने भगवान को धन्यवाद दिया और दिवार पर लगी रानी के माँ की तस्वीर देखने लगे.
थोड़ी देर बाद लड़के वाले अपने घर आने का नेवता देकर वापस चले गये.
रात के ९ बजे थे की राम सिंह का फ़ोन एक बार फिर बजा....
हेलो..मैं राहुल बोल रहा हूँ
कौन राहुल????
वही जिसने आप का पैसा ट्रेडिंग कंपनी में लगवाया था.
हाँ...क्या हुआ ?
एक बुरी खबर है ......कंपनी भाग गयी
क्या....होश में तो हो की तुम क्या कह रहे हो.
हाँ मैं सच बोले रहा हूँ........
राम सिंह के पैर के नीचे से जमीन खिसकी और वह धडाम से गिर पड़ा
रानी को कुछ समझ में नहीं आया की अचानक क्या हो गया...दौड़ कर अन्दर से पानी लायी और राम सिंह को पिलाने लगी.
राम सिंह थोडा समहला और एक लम्बी गहरी साँस लेकर रानी को सब कुछ बता दिया. रानी भी पहले थोडा दुखी हुई पर अगले ही पल हंसकर बोली कोई बात नहीं बाबू जी हम फिर कमा लेंगे. इससे जादा रानी क्या बोलती उसे भी पता था की अब बहुत सारी परेशानिया एक साथ आने वाली थीं जिसमें उसकी शादी भी थी.
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इस भीड़ में सिर्फ राम सिंह ही नहीं था और भी बहुत से लोग थे जिनके सपने टूटे थे. राम सिंह अब अपनी किश्मत कोसता हा फिर सरकार जिसको हम चुनकर भेजते हैं. अब राम सिंह भी क्या करता काफी बड़े लोगों का नाम जुड़े होने के कारण जिसमें जिले के बड़े नेता और पोलिश महकमे के लोग भी थे, उसके कंपनी पर जल्दी विश्वास करने का कारण बनी थी.
राम सिंह मन ही मन सोंच रहा था कि इस देश की सरकार कब सुधरेगी और कब ऐसे लोगों पर लगाम कसेगी जो अपनी मनमानी करते फिर रहे हैं. राम सिंह देश के बाहर के दुश्मनों से तो जंग जीत गाया था पर देश के अन्दर हार गाया.

तेज प्रताप सिंह `तेज` 

Sunday, August 1, 2010

हमें आगे चलना है

अगर हमारी थोड़ी कोशिस से किसी के सूने जीवन मैं बहार आ जाये तो हमें वो थोड़ी कोशिस जरूर करनी चहिये"
भगवान इस संसार मैं सबको एक जैसा ही भेजते है पर समय और परिस्थितयां उसकों और लोगों से अलग कर देती हैं" ...
यहाँ तक की वह अपना सही वजूद भी खो बैड़ता है.
चलिए अब मैं आप को वहां ले चलता हूँ जहाँ मैंने अपनी भावनाओं और दिल की पीड़ा को उलझते हुए देखा है.........
क्या यार तुम तो मेरे रूम का रास्ता ही भूल गए हो....
अरे तेज ...चलो अच्छा हुआ तुम आ गए, और सुना क्या हाल है ....
मैं क्या सुनाऊँ....तू ही आज कल नजर नहीं आता है,
कोई बात है क्या ? आज कल तुम थोडा उदास रहते हो....कुछ हुआ है क्या..
नहीं यार थोडा फॅमिली प्रोब्लम है
फिर भी ..."तुम तो जानते ही हो की पिता जी के न रहने से हमें कितनी मुस्किलों का सामना करना पड़ रहा है"
मैं तुम्हारी प्रोब्लम्स को समझ सकता हूँ पर ऐसे अकेले-अकेले रहने से तो कोई काम नहीं हो सकता है
बोलो मैं क्या कर सकता हूँ तुम्हारे लिए ......
कोई बात नहीं यार जब जरुरत पड़ेगी तो बोलूँगा ..
हाँ पर बोल देना, कोई परेशानी वाली बात नहीं है,
इतना कहने के बाद मैंने रोहित की दी हुई चाय की आखरी चुस्की ली और चलने के लिए इजाजत मांगी ...
दुसरे दिन.....सुबह-सुबह मेरे फ़ोन की घंटी बजी, मैंने मोबाइल उठाया,
रोहित कालिंग...
हाँ!!सुबह-सुबह...
अरे यार तुम घर कब जा रहे हो...
अगले महीने..क्यों क्या हुआ?
कुछ पैसे ला सकते हो मेरे घर से,
हाँ क्यों नहीं..
२ हजार, मैंने माँ से बोले दिया है; वो तुम्हे दे देंगी..
ओके!! यार मैं ले आऊंगा लेकिन अभी जरूरत हो तो बोलो...
नहीं अभी तो मेरे पास हैं
चलो ठीक है
बाय-बाय
"रोहित की आवाज कुछ भारी थी ऐसा लग रहा था जैसे वो मुझसे कुछ छिपा रहा हो ...
लकिन अब किसी के मन की बात तो समझी नहीं जा सकती "..
यह सोचते सोचते मैं फिर से सो गया....अब इतवार को तो कोई उठने की जल्दी नहीं होती है ..
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अरे जल्दी करो नहीं तो ट्रेन छूट जाएगी..
हाँ आ रहा हूँ २ मिनट
हमेशा की तरह इस बार भी मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ ही घर जा रहा था ....
बातों-बातों मैं समय का कुछ पता नहीं चला, ऐसा लगा जैसे हम ट्रेन से उड़ कर घर पहुँच गए हों.
घर पहुचने पर हमें उसी तरह की ख़ुशी मिलती है जैसे की किसी फिल्म निर्माता की पहली फिल्म हिट होने पर....
अगले दिन में रोहित के घर गया
घंटी बजाई .....दरवाजा खुला तो सामने ४० साल का एक आदमी खड़ा था.
मैंने उसको अपने यहाँ आने का कारण बताया...
उसने मुझे बाहर रुकने के लिए बोला...?
"अगले पल मेरे हाथ में २००० रूपये थे. शायद मेरे आने के बारे में उसे सब कुछ पता था."
वापस आने पर मैं सबसे पहले में रोहित के घर गया 
रोहित तुमने मुझे उस बार भी कुछ नहीं बताया....
अब यार कुछ खास बात होती तो मैं जरूर बताता
ओके! यार अब मैं चलता हूँ
थैंक्स यार घर से पैसे लाने के लिए
नो प्रोब्लम, कोई और काम हो तो बोल देना
इतना कहकर मैं चल दिया. लेकिन अभी भी मुझे ऐसा लग रहा था की रोहित कुछ छिपा रहा है.
मैं घर पहुंचा ही था की रोहित का फिर से फ़ोन आया......
हेल्लो! अब क्या हुआ,
कुछ नहीं, मैं घर जा रहा हूँ,
क्या!!! अचानक तुझे ये क्या हो गया.....
खैर अब जा ही रहे हो तो ठीक है पर आने के बाद फ़ोन जरूर कर लेना.
ओके, मैं वापस आऊंगा तो फ़ोन करूँगा.
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आज पूरे ५ दिन हो गए रोहित का कोई फ़ोन नहीं आया और कोई दूसरा नंबर भी मेरे पास नहीं है.
मुझसे रहा नहीं गया, मैं उसके रूम पर पहुँच गया.
बगल वालों से पूछने के बाद जो मुझे पता चला उससे तो मेरे होस ही उड़ गए
लेकिन ये सब कैसे हो गया ...
मुझे भी पता नहीं, पोलिस वाले आये थे उन्हीं से पता चला.
कह रहे थे की किसी आदमीं का उसने खून कर दिया है.
किसका?????
कोई था उसके घर में, शायद उसकी माँ ने दूसरी सादी की थी.
अब मुझे सारी बात धीरे-धीरे समझ में आ रही थी.....की रोहित क्या छिपा रहा था!!
थोड़ी देर मैंने उससे बात की फिर वापस चला आया.
पर मन ही मन में, मैं ये सोचता रहा की आखिर रोहित ने.....?
क्या बात हो सकती है....
"खैर जिंदगी तो चलती ही रहती है
लोग मिलते हैं हवा की तरहं
और फिर उड़ जाते हैं धूल की तरहं....
हमें आगे चलना है, ठीक उसी तरहं जैसे हर सावन में बुलबुल अपना नया घोसला बनाती है."
चलो मैं अब आप से यही कह सकता हूँ की इंतज़ार करिए अगली कड़ी का.......